Navratri Day 1 - शैलपुत्री पूजा / Shailputri mata puja and story

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Shailputri literally means the daughter (पुत्री) of of mountains (शैल/ हिमालय)


देवी दुर्गा के 9 रूप होते हैं।

           
 1- देवी शैलपुत्री / Shailputri
 2- देवी ब्रह्मचारिणी / Brahmachari
 3- देवी चंद्रघण्टा / Chandraghanta
 4- देवी कूष्माण्डा/ Kushmanda
 5- देवी कात्यायनी/ Katyayani
 6- देवी कालरात्रि/ Kalaratri
 7- देवी महागौरी/ Mahagauri
 8- देवी सिद्धिदात्री/ Shiddhidatri
 9- देवी स्कन्दमाता/ Skandamata

पहले स्वरूप मैं माँ शैलपुत्री के नाम से जानी जाती है। यही नव दुर्गाओं मैं प्रथम दुर्गा शैलपुत्री है। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री रूप में प्रकट होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नव रात्र के प्रथम दिन इन्ही की पूजा और उपासना की जाती है। पहली नजर इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है।

शैलपुत्री माता की कथा 


 अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी। तब इनका नाम sati था। एक कथा के अनुसार एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया इसमे सारे देवताओं को अपना- अपना यज्ञ भाग के लिये आमंत्रित किया किंतु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नही किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं। तब वहां जाने के लिए उनका मन विचलित हो उठा। अपनी यह इच्छा शकंर जी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ठ हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है उनके यज्ञ भाग समर्पित किये हैं। किंतु हमें जान बूझ कर नही बुलाया है कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार से भी श्रेष्ठकर नही होगा।



किन्तु, पिता का यज्ञ देखने वहां जाकर माता व बहनों से मिलने के लिए उनकी व्यग्रता किसी प्रकार से कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर जी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि, उनसे कोई भी प्यार से बातचीत भी नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए है, केवल उनकी माता ने उन्हें स्नेह से गले लगाया । बहनों के बातों भी व्यंग्य और उपहास भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत ठेस पहुंचा, उन्होंने यह भी देखा की वहां भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमान जनक प्रश्न भी कहे।

यह सब देखकर शती का ह्रदय दुख से भर उठा। उन्होंने सोचा कि, भगवान शंकर की बात न मान यहां आकर मैने बहुत बडी गलती की है। वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उस रूप को तत्काल ही आग में जला कर भस्म कर दिया। वर्जपात के सामान इस दारूल दुखद घटना को जानकर शंकर जी ने क्रोध में आकर अपने गणो को भेजकर, यज्ञ को पूरी तरीके से तहस-नहस करा दिया। सती योगनी द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैल राज हिमालय के पुत्री के रूप मे जन्म लिया। इस बार वे शैलपुत्री नाम से विख्यात हुई।
 पार्वती, हेमवती उन्ही के नाम है। शैलपुत्री देवी का विवाह शंकर जी से हुआ। पूर्व जन्म भांति इस जन्म में वो शिव जी की अर्द्धागिनी बनी।

एक कलाकार की हैसियत से मेरा ये लेख लिखने का मक़सद है कि, ये कथा आपको पति-पत्नी प्रेम, आत्म सम्मान, निष्ठा और विश्वास की प्रेरणा दे सके। अगर, आपको ये लेख अच्छा लगा हो तो आप कृपया हमसे जुड़े रहे।








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